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Ajay
Friday, July 7, 2023
Thursday, November 2, 2017
हम तो सुधरना ही नहीं चाहते
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| Ajay Gangrade Itarsi MP |
'हां हैं, बैठिये अभी मिलावा देता हूं ' जवाब सुनकर एक निश्चिंतता का भाव चेहरे पर आया ही था कि अगले प्रश्न ने चौंका दिया-
'हेलमेट लगा के आए हो?' सर ने उन्हीं को काॅल देने का कहा है जो एम.आर. हेलमेट लगा के आयेगा। '
शहर के सबसे प्रतिष्ठित हड्डी रोग विशेषज्ञ से सभी एम. आर. मिलना चाहते थे। उनका मधुर व्यवहार सबको भाता था। समाज के लिये चिंता और समयाभाव के कारण कुछ विशेष न कर पाने का मलाल भी डाक्टर साहब की बातों में जब- तब झलकता था परंतु ये हेलमेट वाला माजरा क्या है, वह समझ नहीं पाया । अटेन्डेन्ट ने उसका कौतुहल मिटाया।
'आप लोग सब जगह बाईक से आते-जाते हैं, कितनी रिस्क होती है। अाप लोगों के लिये सोचकर ही सर ने यह नियम बना दिया है।'
सामान्यत: एमआर अपनी विजिट मोटरसाइकिल से ही करते थे।
कुछ दिन बाद अटेन्डेन्ट ने डॅाक्टर साहब को बताया कि जो एम आर हेलमेट पहनकर नहीं आता है वह पहले मिलकर गये एम. आर. का हेलमेट उधार मांग कर आपसे मिलने आ रहे हैं।
डॅाक्टर साहब सचेत हो गये, जांच होने लगी कि कहीं एक ही हेलमेट का बार-बार उपयोग तो नहीें हो रहा है।
कुछ दिन बाद पता चला कि आसपास की प्रत्येक मेडिकल शॅाप पर 2-4 हेलमेट रख्ाे हुए हैं और एम. आर. वहां से हेलमेट उठाकर डाक्टर साहब से अपनी विजिट पूरी कर रहे हैं।
-- अजय गंगराड़े, इटारसी मोबाइल 8989414052
Wednesday, November 17, 2010
Laghukatha (SANTUSHTI) AJAY GANGRADE ITARSI
लघुकथा - संतुष्टि
अजय गंगराड़े, नेहरूगंज इटारसी
बद्रीप्रसाद जी के चार बेटे थे. उन्होंने सभी को बराबर माना . छोटे बड़े का भेदभाव नहीं रखा, कभी उपहार भी लाते तो ध्यान रखते कि समानता का व्यव्हार हो परन्तु बेटे कमी निकालकर ताना देते रहते.
अपने अंतिम समय तक बद्रीप्रसाद जी ने सारी संपत्ति चार लाख रुपए में बेच दी और मृत्यु शैया पर चारों को बुलाकर एक-एक लाख रुपए देकर निश्चिंतता से आँखे मूँद ली.
तभी उनके कानो में सुनाई दिया पिताजी ने फिर बेईमानी कि है.
मुझे पुराने नोट दिये और बड़े भैया को नए-नए.
अजय गंगराड़े, नेहरूगंज इटारसी
Monday, October 11, 2010
HUM NAHI SUDHRENGE. (LAGHU KATHA)
लघु कथा
एक गरीब बस्ती के पास से निकलते पिछले माह सेवानिवृत हुए मोहन बाबू दो साल के बच्चे को पिटते देख व्याकुल हो उठे. उन्हें समझते देर नहीं लगी की की तीन बच्चो की माँ गरीबी और आभाव की वजह से इस सुन्दर बच्चे पर अपनी खीज, अपना गुस्सा उतार रही है, पहले तो उन्हें लगा की क्यों न इस बच्चे के लालन पालन की जिम्मेदारी स्वयं ले लें, फिर मन में आया की नगर के सर्वोदय उपकार संस्था को इसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, लम्बे प्रयासों के बाद मोहन बाबू अंततः उस बच्चे को सर्वोदय में प्रवेश दिलाने में सफल हो गए, समय बीतता गया, एक दिन वे रिंकू का हालचाल लेने सर्वोदय पहुंचे नई ड्रेस और नए जूते मोजो में रिंकू को स्कूल में पढ़ता देख मोहन बाबू को लगा के जैसे उनका जीवन सफल हो गया. वे अपने को धन्य समझने लगे.
इधर रिंकू की माँ ने दो और बच्चों को जन्म दे दिया.
अजय गंगराड़े, गंगराड़े टाइपिंग, नेहरु गंज, इटारसी
एक गरीब बस्ती के पास से निकलते पिछले माह सेवानिवृत हुए मोहन बाबू दो साल के बच्चे को पिटते देख व्याकुल हो उठे. उन्हें समझते देर नहीं लगी की की तीन बच्चो की माँ गरीबी और आभाव की वजह से इस सुन्दर बच्चे पर अपनी खीज, अपना गुस्सा उतार रही है, पहले तो उन्हें लगा की क्यों न इस बच्चे के लालन पालन की जिम्मेदारी स्वयं ले लें, फिर मन में आया की नगर के सर्वोदय उपकार संस्था को इसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, लम्बे प्रयासों के बाद मोहन बाबू अंततः उस बच्चे को सर्वोदय में प्रवेश दिलाने में सफल हो गए, समय बीतता गया, एक दिन वे रिंकू का हालचाल लेने सर्वोदय पहुंचे नई ड्रेस और नए जूते मोजो में रिंकू को स्कूल में पढ़ता देख मोहन बाबू को लगा के जैसे उनका जीवन सफल हो गया. वे अपने को धन्य समझने लगे.
इधर रिंकू की माँ ने दो और बच्चों को जन्म दे दिया.
अजय गंगराड़े, गंगराड़े टाइपिंग, नेहरु गंज, इटारसी
Sunday, October 10, 2010
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