Wednesday, November 17, 2010

Laghukatha (SANTUSHTI) AJAY GANGRADE ITARSI

लघुकथा - संतुष्टि
बद्रीप्रसाद जी के चार बेटे थे. उन्होंने सभी को बराबर माना .  छोटे बड़े का भेदभाव नहीं रखा, कभी उपहार भी लाते  तो ध्यान रखते कि समानता का व्यव्हार हो परन्तु बेटे कमी निकालकर ताना देते रहते.
अपने अंतिम समय तक बद्रीप्रसाद जी ने सारी संपत्ति चार लाख रुपए में बेच दी और मृत्यु शैया पर चारों को बुलाकर एक-एक लाख रुपए देकर निश्चिंतता से आँखे मूँद ली.
तभी उनके कानो में सुनाई दिया पिताजी ने फिर बेईमानी कि है.
मुझे पुराने नोट दिये  और बड़े भैया को नए-नए.

अजय गंगराड़े, नेहरूगंज   इटारसी

Monday, October 11, 2010

HUM NAHI SUDHRENGE. (LAGHU KATHA)

लघु कथा
एक गरीब बस्ती के पास से निकलते पिछले माह सेवानिवृत हुए मोहन बाबू दो साल के बच्चे को पिटते देख व्याकुल हो उठे. उन्हें समझते देर नहीं लगी की की तीन बच्चो की माँ गरीबी और आभाव की वजह से इस सुन्दर बच्चे पर अपनी खीज, अपना गुस्सा उतार रही है, पहले तो उन्हें लगा की क्यों न इस बच्चे के लालन पालन की जिम्मेदारी स्वयं ले लें, फिर मन  में आया की नगर के सर्वोदय उपकार संस्था को इसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, लम्बे प्रयासों के बाद मोहन बाबू अंततः उस बच्चे को सर्वोदय में प्रवेश दिलाने में सफल हो गए, समय बीतता गया, एक दिन वे रिंकू का हालचाल  लेने सर्वोदय पहुंचे नई ड्रेस और नए जूते मोजो में रिंकू को स्कूल में पढ़ता देख मोहन बाबू  को लगा के जैसे उनका जीवन सफल हो गया. वे अपने को धन्य समझने लगे.
इधर रिंकू की माँ ने दो और बच्चों को जन्म दे दिया.
अजय गंगराड़े, गंगराड़े टाइपिंग, नेहरु गंज, इटारसी